पश्चिम बंगाल में विद्यापति मंच, सिलीगुड़ी द्वारा विद्यापति स्मृति पर्व समारोह का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन न केवल मिथिला की समृद्ध संस्कृति एवं साहित्य को सहेजने का एक महत्वपूर्ण प्रयास कर रही है। इसी क्रम में 13 अप्रैल को सिलीगुड़ी में विद्यापति स्मृति पर्व समारोह हो रहा है। ऐसे में आपको विद्यापति के बारे में कुछ बता रहा हूं। क्या आपको पता है कि स्वयं मां गंगा जब विद्यापति से मिलने पहुंची थी।
भारत में ऐसे कई जगहें हैं जहां भक्त की तपस्या को देख भगवान खुद प्रकट होकर दर्शन दिए हैं। भारत में कई ऐसे स्थल साक्ष्य के रूप में विद्यमान हैं. ये स्थल लोगों के लिए आस्था का केंद्र हैं। चाहे वो श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या हो या फिर श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा। जहां विश्व के कोने-कोने से लोग दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा ही एक स्थल है बिहार के समस्तीपुर जिले का विद्यापतिधाम के नाम से देशभर में विख्यात है।
क्यों है यह विख्यात : इसे भक्त और भगवान का मिलन स्थल कहा जाता है। यहां भगवान शिव और भक्त कवि विद्यापति की पूजा एक साथ होती है। भगवान शिव का यह मंदिर हजारों-लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार जो यहां सच्चे मन से याचना कर ले भोलेनाथ उनकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं।
कहा जाता है बिहार का देवघर: समस्तीपुर जिले के विद्यापतिधाम मंदिर की महिमा चारों तरफ फैली हुई है। “बिहार का देवघर” के रूप में चर्चित यह स्थान शिव भक्तों का तीर्थ स्थली कहा जाता है, जहाँ राज्य के बाहर से श्रद्धालु आकर जलाभिषेक कर मन्नत माँगते हैं। कहा जाता है कि मां गंगा से मिलने निकले कवि विद्यापति जब चलते-चलते थक हार कर बैठ गए तो इसी जगह गंगा उनसे मिलने आ पहुंची थीं। यही कारण है यहां सावन के अलावा अन्य दिनों में भी श्रद्धालुओं की काफी भीड़ देखने को मिलती है। सावन में सोमवारी के दिन यहां जलाभिषेक करनेवाले श्रद्धालुओं की संख्या डेढ़ लाख तक पहुंच जाती है। बड़ी संख्या में ऐसे श्रद्धालु यहां आते हैं, जो जलाभिषेक के लिए मंदिर परिसर स्थित कुएं से जल लेते हैं, और अंततः स्थिति यह हो जाती है कि कुएं ही सूख जाते हैं, फिर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मोटर चलाकर कुएं में जल भरा जाता है। नेपाल से भी आते हैं श्रद्धालु: विद्यापति धाम मंदिर में पूजा करने सावन में उत्तर बिहार के विभिन्न जिलों और नेपाल तक के श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां बड़ी संख्या में लोग कांवर लेकर भी पहुंचते हैं. स्थानीय व आसपास के जिलों के लोग मंदिर में आने से पहले पास के चमथा, छमटिया और कटहा स्थित गंगा घाटों पर स्नान के बाद जलाभिषेक के लिए गंगाजल उठाते हैं। लेकिन बड़ी संख्या वैसे श्रद्धालुओं की भी है जो घर से सीधे मंदिर आते हैं।ऐसे श्रद्धालुओं में कुछ तो मंदिर के पंडों से जल लेते हैं जबकि बड़ी संख्या में लोग मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित कुएं से जलाभिषेक के लिए जल उठा लेते हैं। सोमवारी को आते हैं एक लाख से ज्यादा लोग: स्थानीय लोगों के मुताबिक आम दिनों में आने वाले श्रद्धालु भी कुएं से जल लेकर बाबा की पूजा अर्चना करते हैं, लेकिन सावन में ऐसी भीड़ उमड़ती है कि श्रद्धालुओं द्वारा लगातार जल निकाले जाने से कुआं सूख जाता है। बता दें कि कुएं का पानी खत्म होने पर मोटर चलाकर जल भरना होता है. मंदिर की ओर से कुएं में जल भरने के लिए मोटर की व्यवस्था रखी गई है. स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर में खासकर सावन महीने में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है. सावन में तो हर रविवार व सोमवार को डेढ़ लाख लोग जल अर्पित करते हैं। विद्यापति से मिलने आई थीं गंगा: इस स्थल पर ही भगवान शंकर व गंगा भक्त आदि कवि विद्यापति का निर्वाण हुआ था। अपने जीवन के अंतिम समय में वो गंगा के लिए चले थे। पैदल चलते-चलते इसी स्थान पर थक हार कर बैठ गए थे। जिसके बाद पास में मिले चरवाहे से पूछा कि यहां से गंगा कितनी दूर है। जिस पर चरवाहे ने ढाई से तीन कोस की दूरी बताई। फिर विद्यापति यह कहते हुए वहीं रुक गये कि वे उतनी दूर से मां गंगा के लिए आ सकते हैं तो मां गंगा यहां तक नहीं आ सकती है? कहा जाता है कि उसके बाद गंगा की धारा वहां पहुंची और विद्यापति को अपने साथ लेकर चली गई। उनकी लिखे पद आज भी मिथिला की संस्कृति के अभिन्न अंग के रूप में गाये एवं पसंद किये जाते हैं।उनके पदों में गंगा-स्तुति मुझे अत्यंत प्रिय है—
गंगा-स्तुति: बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे, छोड़इत निकट नयन बह नीरे, कर जोरि बिनमओ विमल तरंगे, पुन दरसन होए पुनमति गंगे, एक अपराध छेमव मोर जानी, परसल माय पाय तुअ पानी
कि करब जप तप जोग धेआने, जनम कृतारथ एकहि सनाने,
भनइ विद्यापति समदओं तोंही,अंत काल जनु बिसरह मोही
गंगा नदी मां के समान पूजित हैं। उन पर श्रद्धा-युक्त, इतनी मार्मिक कविता शायद् ही कभी लिखी गई हो !इनके अतिरिक्त अपनी पसंद की कुछ अन्य पदों की भी चर्चा करना चाहूँगा, जो बड़े लोकप्रिय है: जय जय भैरवि असुर भयाउनि.., कखन हरब दुख मोर..,माधव हम परिणाम निराशा ,बारहमासा,सखि हे हमर दुखक नहिं ओर, सुनु रसिया अब न बजाऊ बिपिन बंसिया..बसंत-शोभा,बड़ अजगुत देखल तोर.. जयति जय मां अम्बिके..आदि। भगवान शिव के साथ होती है विद्यापति की पूजा: विद्यापतिघाम मंदिर में भगवान शिव के साथ उनके परम भक्त आदि कवि विद्यापति ( जिसके लिए गंगा खुद आईं ) की भी श्रद्धालु पूजा करते हैं।मुख्य मंदिर में एक बड़ा और एक छोटा पत्थर है. बड़े पत्थर को शिवलिंग और छोटे पत्थर को विद्यापति कहा जाता है। ( अशोक झा की कलम से )
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