वक्फ संशोधन बिल गुरुवार देर रात राज्यसभा में भी पास हो गया. लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों की मंजूरी के बाद अब यह बिल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पास है। उनकी मंजूरी के बाद यह कानून की शक्ल ले लेगा। आज शनिवार है। आईबी भी अलर्ट मोड पर है। चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही है।वक्फ बिल पर जेडीयू में फूट पड़ती नजर आ रही है. मोदी सरकार को वक्फ बिल पर एनडीए के पुराने सहयोगी बीजू जनता दल (बीजेडी) से बड़ा बेनिफिट मिला. पहले बीजेडी ने वक्फ बिल का विरोध करने की बात कही थी, और अपने सांसदों को वक्फ बिल के खिलाफ वोट देने के लिए कहा था, लेकिन अब पार्टी ने अपने सांसदों को इस मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से वोट देने की छूट दे दी है. बीजेडी ने राज्यसभा में अपने सांसदों के लिए कोई व्हिप जारी नहीं किया है और न ही कोई खास निर्देश दिया है. पार्टी के इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. पहले यह माना जा रहा था कि कभी बीजेपी की सहयोगी रही बीजेडी इस बिल के खिलाफ वोट कर सकती है.
मुस्लिम वक्फ बोर्ड के मुद्दे पर देश की विपक्षी पार्टियां जिस तरह गफलत में दिखाई पड़ती हैं उसका कारण भारत की जमीनी हकीकत से नावाकिफ होना है। वक्फ की सम्पत्तियों का देश में जिस तरह जाल फैला हुआ है उससे आम भारतीय प्रभावित न होता हो, ऐसा नहीं है।अतः केन्द्र की मोदी सरकार इस सम्बन्ध में जो विधेयक लाई है उसका स्वागत सामान्य तौर पर देश की जनता करती दिखाई पड़ती है। इस बारे में मुस्लिम वक्फ बोर्डों की विभिन्न राज्यों में जो गतिविधियां रही हैं उन्हें देखते हुए नागरिकों में भीतर ही भीतर रोष रहा है। भाजपा ने इस रोष का संज्ञान लेते हुए ही वक्फ संशोधन विधेयक रखा है। बेशक वक्फ बोर्ड का इतिहास 1913 से अंग्रेजों के शासन के दौरान तक रहा है और इसके बाद समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे। इन संशोधनों में सबसे बड़ा संशोधन 1995 में तत्कालीन कांग्रेस की नरसिम्हाराव सरकार के दौरान किया गया। यह वह दौर था जब देश में राम जन्मभूमि को लेकर उपजे आन्दोलन का अन्त हो चुका था।अयोध्या में स्थित बाबरी मस्जिद को 1992 के दिसम्बर महीने में ढहा दिया गया था। इसके बाद मुसलमानों को खुश रखने के लिए नरसिम्हा राव सरकार वक्फ संशोधन विधेयक लेकर आयी थी। इस कानून में तब जो परिवर्तन किये गये थे उसमें सबसे बड़ा संशोधन यह था कि किसी जमीन या जायदाद के बारे में वक्फ बोर्ड का फैसला अन्तिम था जो कि एक ट्रिब्यूनल के माध्यम से होता। ट्रिब्यूनल के फैसले को दीवानी अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती थी और केवल पुनर्विचार याचिका ही न्यायालय में दाखिल की जा सकती थी। इसके बाद 2013 में मनमोहन सरकार में इसमें संशोधन किया। इससे वक्फ बोर्डों को यह अधिकार मिल गया था कि वह जिस जमीन या जायदाद पर अपना दावा पेश कर दे वह उसी की मानी जाती थी। इसके साथ ही जिस जमीन का उपयोग पहले से ही धार्मिक कार्य के लिए कोई व्यक्ति कर रहा हो उसे भी वक्फ की जमीन ही माना जाना लाजिम बना दिया गया था। एेसे नियम की जद में वे एेतिहासिक स्थल भी आ गये थे जो पुरातत्व संरक्षण में चल रहे थे। अतः जो संशोधन विधेयक अल्पसंख्यक मन्त्री श्री किरण रिजीजू ने संसद में रखा वह सभी एेतिहासिक व पुरातत्व महत्व के स्थलों को वक्फ के चंगुल से निकालता है।पूरे देश में ऐसी ऐतिहासिक इमारतें चारों तरफ फैली हुई हैं जिनका रखरखाव पुरातत्व विभाग करता है। मगर ऐसे स्थलों पर नमाज पढ़कर इन्हें धार्मिक चश्मे से देखने की कोशिश वक्फ बोर्ड करता था। श्री रिजीजू ने ऐसे सभी स्थलों को वक्फ जायदाद से बाहर कर दिया है। इसके साथ यह भी हकीकत है कि 1995 के बाद से वक्फ की सम्पत्तियों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इन सम्पत्तियों का संज्ञान 2006 में मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति का जयाजा लेने वाली सच्चर समिति ने लिया था और कहा था कि तब तक वक्फ की कुल चार लाख 90 हजार सम्पत्तियों से वार्षिक आय 163 करोड़ रुपए की होती थी। सच्चर समिति का कहना था कि यदि इन सम्पत्तियों का सही उपयोग किया जाये तो आय कम से कम दस हजार करोड़ रुपए की होनी चाहिए परन्तु अब ये सम्पत्तियां बढ़कर नौ लाख के करीब हो गई हैं परन्तु इनसे आय और भी घट गई है। सच्चर समिति का कहना था कि वक्फ की सम्पत्तियों से आय बढ़ाकर इसका उपयोग गरीब मुसलमानों की आर्थिक मदद में किया जा सकता है क्योंकि समिति ने यह भी पाया था कि भारत में मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों से भी बदतर है। अतः समझने वाली बात यह है कि वक्फ का मसला हिन्दू-मुसलमानों का मसला नहीं है बल्कि यह मानवीय मसला है क्योंकि देश के 90 प्रतिशत मुसलमान पसमान्दा मुसलमान हैं जो किसी तरह अपनी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं। इसलिए श्री रिजीजू ने वक्फ विधेयक में प्रावधान रखा है कि केन्द्रीय स्तर पर बनने वाली राष्ट्रीय वक्फ परिषद में मुसलमानों के सभी मुख्य फिरकों के प्रतिनिधि रखे जायेंगे और महिलाओं के साथ ही पसमान्दा मुसलमानों के नुमाइन्दे भी होंगे तथा मुसलमानों के अलावा अन्य धर्म के मानने वाले लोगों का भी प्रतिनिधित्व होगा। यह कहा जा रहा है कि इससे मुसमानों के आन्तरिक धार्मिक मसलों में मदालखत होगी जो कि पूरी तरह सत्य नहीं है क्योंकि वक्फ की जमीनों की देखभाल करने के लिए मुतल्लवी या प्रबन्धक होता है। वह हर हालत में मुसलमान ही होगा। इसमें किसी भी प्रकार की बुराई नजर नहीं आती है क्योंकि यह धार्मिक मामलों में सरकार का हस्तक्षेप नहीं है बल्कि जमीन-जायदाद की देखभाल करने का सवाल है। इस बारे मेंं देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों ने अभी तक जो फैसले दिये हैं उनमें वक्फ बोर्डों को एक वैधानिक संस्था माना गया है न कि धार्मिक। सवाल यह है कि जब हम ढोल पीट-पीट कर यह दुहाई देते हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तो मुसलमानों का कोई मसला आते ही क्यों हमारा गला सूखने लगता है? श्री रिजीजू ने जब संसद में विधेयक रखकर यह कहा कि भारत के वक्फ बोर्डों के पास पूरी दुनिया में सबसे अधिक दान में मिली जमीन-जायदाद है तो इसका उपयोग गरीब मुसलमानों के हित में क्यों नहीं किया जाना चाहिए। वक्फ बोर्डों को हमने भूमि हथियाने वाले माफिया में क्यों बदल डाला है। जबकि आम मुसलमान अपनी जमीन-जायदाद जन कल्याण के लिए दान या वक्फ करता है। वक्फ की जमीन अल्लाह की जमीन होती है अतः इसका उपयोग भी उसके बन्दों की खिदमत में होना चाहिए। भारत में जमीन-जायदाद के वैध कागजों के साथ ही उसका आंकलन जाता किया है अतः वक्फ की गई जायदाद के कागजात भी होना जरूरी है। जबकि कुछ लोग सरकारी जमीनों को भी वक्फ की जमीन बताने से नहीं हिचकते। इस नये विधेयक से ऐसे सभी दावों का पर्दाफाश भी होगा। ( अशोक झा की कलम से)
वक्फ संशोधन बिल कानून बनते ही गरीब मुसलमानों के जीवन में होगा यह सुधार
अप्रैल 05, 2025
0
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/