राजस्थान में एक कहाबत काफी चरितार्थ है जहां ना जाए गाड़ी वहां जाए मारवाड़ी। ठीक इसी प्रकार बिहारियों की क्षमता देख दुनियां बोलती है एक बिहारी सौ पर भारी। जी हां यह सौ फीसद सच है। जिस काम को कोई नहीं कर पाता उसे एक बिहारी पूरा करने में गर्व का अनुभूति दिलाते है। इस लिए हम कहते है हमे गर्व है कि हम बिहारी है। बंगाल मेरा कर्म भूमि है पर जन्मभूमि तो है बिहार ही। हम यह आज इसलिए कह रहे है क्योंकि आज ही के दिन 1912 में बंगाल प्रेसीडेन्सी से अलग होकर बिहार एक अस्तित्व में आया था। आज दुनिया में बिहारी शब्द अपने आप में काफी है, जो दुनिया को स्मरण कराता है अपने प्राचीन गौरव का। जिस समय संसाधन आज की तरह विकसित नहीं हुए थे उस समय दुनिया के लिए बिहार ज्ञान का केंद्र था। आज जब हम देखते हैं छोटे से रोजगार के लिए बिहार के लोगों को पलायन करना पड़ रहा है तो जरूरत महसूस होती है कि यहां उद्यमिता की क्रांति हो।''आज यदि हमने आपस में संघर्ष करना छोड़ दिया और पुराने गौरव का स्मरण करते हुए अनुसरण करना शुरू किया तो बिहार विकास की दौड़ में एक लंबी छलांग लगाने में सक्षम है। आज स्टार्टअप्स की क्रांति यदि बिहार में होती है तो प्रदेश में औद्योगिकरण बढ़ेगा और बिहार जहां देश में सबसे अधिक युवा आबादी है उस युवा आबादी को रोजगार भी मिलेगा। बिहारी होने का इसलिए गर्व है क्योंकि दुनिया में उनका जो कुछ भी थोड़ा अपना है वह बिहार है। देश में बिहार के प्रति जो परसेप्शन है वह नेगेटिव है। उसका 70% कारण मीडिया नॉरेटिव है और 30% लोगों के विचार प्रॉब्लम है, जिसे ठीक करने की जरूरत है। हम आपको बताते है बिहार, एक ऐसा राज्य जो सिर्फ अपने लिट्टी-चोखा के लिए नहीं, बल्कि अपनी अमूल्य धरोहर, कला, शिक्षा और परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। 22 मार्च को बिहार दिवस मनाया जाता है, जो इस गौरवशाली भूमि की ऐतिहासिक यात्रा की याद दिलाता है। इस राज्य ने नालंदा विश्वविद्यालय से लेकर छठ पूजा तक, मधुबनी चित्रकला से लेकर मखाने तक भारत की संस्कृति को समृद्ध किया है। यह दिन सिर्फ बिहारियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का दिन है। माना जाता है कि मधुबनी या मिथिला चित्रकला की शुरुआत रामायण काल में राजा जनक द्वारा राम-सीता विवाह के अवसर पर की गई थी। यह कला प्राकृतिक रंगों से बनाई जाती थी, जिसमें बांस की लकड़ी, उंगलियों और माचिस की तीलियों का उपयोग किया जाता था। यह सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि नेपाल के कुछ हिस्सों में भी प्रचलित है। मधुबनी पेंटिंग में शादी-ब्याह, पौराणिक कथाएं, देवी-देवताओं की झलक और प्रकृति के सुंदर चित्र देखने को मिलते हैं। आज यह कला कपड़ों, कैनवास और वॉल पेंटिंग्स पर भी बनाई जाने लगी है और इसे पूरी दुनिया में सराहा जाता है।बिहार दिवस न केवल राज्य के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है, बल्कि यह बिहार की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक यात्रा का भी प्रतीक है। बिहार ने केवल भारतीय राजनीति और समाज की धारा में अहम योगदान देने वाला राज्य है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी अतुलनीय है। बिहार का इतिहास हजारों साल पुराना है। बिहार का प्राचीन इतिहास भारतीय सभ्यता के सबसे गौरवमयी अध्यायों में से एक है। प्राचीन काल में इसे मगध के नाम से जाना जाता था। बिहार में ही चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक जैसे महान सम्राट हुए, बिहार में ही बौद्ध धर्म का उदय हुआ, बिहार में ही नालंदा जैसा विश्वविद्यालय था, जहां अध्ययन करने के लिए दुनिया भर से लोग आते थे। बिहार में ही भगवान महावीर ने पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया, बिहार में ही महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट को जन्म हुआ। बिहार का इतिहास सिर्फ पुराना नहीं, बल्कि अत्यंत समृद्ध और प्रेरणादायक भी है। बिहार के इसी गौरवाशली इतिहास को आगे बढ़ाने के लक्ष्य से हर साल बिहार दिवस मनाया जाता है। इसका लक्ष्य लोगों को बिहार और उसकी सभी खूबियों पर गर्व महसूस कराना है। बिहार दिवस इतिहास?: बिहार राज्य का गठन 22 मार्च 1912 को हुआ था। इसी दिन बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करके एक नया राज्य बनाया गया था। पहला बिहार दिवस 2010 में मनाया गया था। इस दिन बिहार में सार्वजनिक अवकाश होता है। पूरे राज्य में बिहार दिवस को सांस्कृतिक कार्यक्रमों, परेड और अन्य कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है। 22 मार्च 1912 को ब्रिटिश सरकार ने बिहार को बंगाल प्रेसीडेन्सी से अलग कर एक नई प्रेसीडेन्सी का गठन किया। उस वक्त बिहार का क्षेत्रफल बहुत बड़ा था, जिसमें वर्तमान बिहार, झारखंड ओडिशा के कुछ हिस्से शामिल थे। बिहार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा यहां की धरती ने कई महान क्रांतिकारियों स्वतंत्रता सेनानियों को जन्म दिया, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया।प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक बिहार की धरती से कई महान शख्सियतों ने देश-दुनिया में अपना परचम लहराया। विद्यापति, भगवान बुद्ध महावीर से बिहार को खास पहचान मिली है। चाणक्य, चंद्रगुप्त मौर्य सम्राट अशोक का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। इसके साथ ही, देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म बिहार के सिवान में हुआ था। बिहार की धरती से रामधारी सिंह दिनकर, बाबा नागार्जुन (बैधनाथ मिश्र यात्री) जैसे महान कवि निकले हैं। गया में दशरथ मांझी जैसे शख्स ने जन्म लिया, जिन्होंने पहाड़ का सीना चीरकर यह संदेश दिया कि इंसान के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।इस धरती का इतिहास अत्यधिक गौरवपूर्ण रहा है। पिछले कुछ दशकों में बिहार ने विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। बिहार की सांस्कृतिक धरोहर भी बहुत समृद्ध है। यहां की कला, साहित्य, संगीत नृत्य शैली भारत की सांस्कृतिक धारा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बिहार की मगही, भोजपुरी मैथिली जैसी भाषाएं साहित्यिक धरोहर के रूप में पहचान प्राप्त कर चुकी हैं। राजगीर, बोधगया, पटना साहिब, वैशाली, नालंदा जैसे ऐतिहासिक स्थल बिहार के गौरवमयी इतिहास को संजोए हुए हैं। बिहार का सबसे प्रसिद्ध व्यंजन लिट्टी-चोखा सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि इसके ऐतिहासिक महत्व के कारण भी लोकप्रिय है। इसकी शुरुआत मगध साम्राज्य में हुई थी और यह सैनिकों का मुख्य भोजन था क्योंकि इसे बनाना और पैक करना आसान था। 1857 के विद्रोह में भी तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई के सैनिक इसे खाते थे। सत्तू से भरी यह लिट्टी और बैंगन-आलू के चोखे का मेल बिहार की अनोखी पाक कला का उदाहरण है।मखाना: बिहार का सुपरफूड, जो पूरी दुनिया में मशहूर: भारत में जितना भी मखाना पैदा होता है, उसका 90% उत्पादन बिहार में होता है। यह एक सुपरफूड माना जाता है, जो प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है। मखाने की खेती मुख्य रूप से मल्लाह समुदाय के लोग करते हैं और यह बिहार की प्रमुख आर्थिक फसल भी है। गर्मियों में यह शरीर को ठंडक देने के लिए जाना जाता है और इसे स्नैक्स के रूप में भी खाया जाता है।छठ पूजा: सूर्य की उपासना का सबसे बड़ा पर्व: बिहार का सबसे बड़ा महापर्व छठ पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और आस्था का संगम है। इसकी शुरुआत त्रेतायुग में माता सीता और द्वापर युग में द्रौपदी द्वारा सूर्य देव की पूजा से मानी जाती है। यह पर्व विशेष रूप से सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। छठ पूजा के दौरान महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और गंगा या किसी पवित्र नदी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देती हैं। ( पटना से अशोक झा की कलम से)
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